الكِتَابُ السَّادِس: الإِمامة والجماعة

1382 - (ق) عَنْ مالِكِ بْنِ الحُوَيْرِثِ: أَتَيْتُ النَّبِيَّ صلّى الله عليه وسلّم فِي نَفَرٍ مِنْ قَوْمِي، فَأَقَمْنَا عِنْدَهُ عِشْرِينَ لَيْلَةً، وَكَانَ رَحِيماً رَفِيقاً، فَلَمَّا رَأَى شَوْقَنَا إِلَى أَهَالِينَا، قَالَ: (ارْجِعُوا فَكُونُوا فِيهِمْ، وَعَلِّمُوهُمْ، وَصَلُّوا، فَإِذَا حَضَرَتِ الصَّلاَةُ؛ فَلْيُؤَذِّنْ لَكُمْ أَحَدُكُمْ، وَلْيَؤُمَّكُمْ أَكْبَرُكُمْ) .

अबू सुलैमान मालिक बिन हुवैरिस (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि हम लोग अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आए। हम लोग उस समय लगभग समान आयु वाले जवान थे। हम आपके पास बीस दिन ठहरे। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बहुत ही दयालु और नरम स्वभाव के मालिक थे। आपको लगा कि हम लोग अपने परिवार की ओर लौटने की इच्छा रखते हैं, इसलिए हमसे हमारे परिवार के बारे में पूछा, तो हमने आपको बताया। इसपर आपने फ़रमायाः "अपने परिवार ओर वापस जाओ, उनके बीच रहो, उन्हें शिक्षा प्रदान करो, आदेश दो और अमुक नमाज़ अमुक समय में तथा अमुक नमाज़ अमुक समय में पढ़ो। जब नमाज़ का समय आ जाए, तो तुममें से एक व्यक्ति तुम्हारे लिए अज़ान दे और तुममें सबसे अधिक आयु वाला व्यक्ति तुम्हारी इमामत करे।"

1384 - (م) عَنْ أَبِي مَسْعُودٍ الأَنْصَارِيِّ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صلّى الله عليه وسلّم: (يَؤُمُّ الْقَوْمَ أَقْرَؤُهُمْ لِكِتَابِ اللهِ، فَإِنْ كَانُوا فِي الْقِرَاءَةِ سَوَاءً فَأَعْلَمُهُمْ بِالسُّنَّةِ، فَإِنْ كَانُوا فِي السُّنَّةِ سَوَاءً فَأَقْدَمُهُمْ هِجْرَةً، فَإِنْ كَانُوا فِي الْهِجْرَةِ سَوَاءً فَأَقْدَمُهُمْ سِلْماً [1] ، وَلاَ يَؤُمَّنَّ الرَّجُلُ الرَّجُلَ فِي سُلْطَانِهِ [2] ، وَلاَ يَقْعُدْ فِي بَيْتِهِ عَلَى تَكْرِمَتِهِ [3] إِلاَّ بِإِذْنِهِ) .

अबू मसऊद अंसारी -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : “जो क़ुरआन को सर्वाधिक याद रखता हो वह लोगों की इमामत करे, यदि सारे लोग क़ुरआन को याद करने में समान हों तो जो सर्वाधिक सुन्नत का ज्ञानी हो (वह इमामत करे), यदि सभी लोग सुन्नत के ज्ञान में भी समान हों तो जिसने सर्वप्रथम हिजरत की हो वह इमामत करे, और यदि हिजरत करने में भी सभी समान हों तो जिसने सर्वप्रथम इस्लाम धर्म अपनाया हो वह इमामत करे, (और याद रहे) कोई आदमी किसी आदमी की हुकूमत की जगह में जाकर इमामत न करे, और उसके घर में उसके मसनद पर उसकी आज्ञा के बिना न बैठे।”

1385 - (ق) عَنْ أَنَسِ بْنِ مالِكٍ قَالَ: مَا صَلَّيْتُ وَرَاءَ إِمَامٍ قَطُّ أَخَفَّ صَلاَةً وَلاَ أَتَمَّ مِنَ النَّبِيِّ صلّى الله عليه وسلّم، وإِنْ كَانَ لَيَسْمَعُ بُكَاءَ الصَّبِيِّ فَيُخَفِّفُ، مَخَافَةَ أَنْ تُفْتَنَ أُمُّهُ.

अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि मैंने किसी इमाम के पीछे नमाज़ नहीं पढ़ी, जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से अधिक हल्की और संपूर्ण नमाज़ पढ़ाता हो।

1386 - (ق) عَنْ أَبِي مَسْعُودٍ الأَنْصَارِيِّ قَالَ: جَاءَ رَجُلٌ إِلَى رَسُولِ اللهِ صلّى الله عليه وسلّم فَقَالَ: يَا رَسولَ اللهِ، إِنِّي وَاللهِ لأَتَأَخَّرُ عَنْ صَلاَةِ الغَدَاةِ مِنْ أَجْلِ فُلاَنٍ، مِمَّا يُطِيلُ بِنَا فِيهَا، قَالَ: فَمَا رَأَيْتُ النَّبِيَّ صلّى الله عليه وسلّم قَطُّ أَشَدَّ غَضَباً في مَوْعِظَةٍ مِنْهُ يَوْمَئِذٍ، ثُمَّ قَالَ: (يا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّ مِنْكُمْ مُنَفِّرِينَ [1] ، فَأَيُّكُمْ مَا صَلَّى بِالنَّاسِ فَلْيُوجِزْ، فَإِنَّ فِيهِمُ الْكَبِيرَ وَالضَّعِيفَ وَذَا الْحَاجَةِ) .

अबू मसऊद अन्सारी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, उन्होंने फ़रमाया कि एक आदमी ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया : ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ! मेरे लिए नमाज़ जमाअत से पढ़ना मुश्किल हो गया है, क्योंकि फलां आदमी नमाज़ बहुत लम्बी पढ़ाते हैं । अबू मसऊद अन्सारी रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि मैंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को नसीहत के वक़्त उस दिन से ज़्यादा कभी गुस्से में नहीं देखा । आपने फ़रमाया : “लोगो ! तुम दीन से नफ़रत दिलाने वाले हो । देखो जो कोई लोगों को नमाज़ पढ़ाये उसे चाहिए कि हल्की नमाज़ पढ़ाये, क्योंकि पीछे नमाज़ पढ़ने वालों में बीमार, कमज़ोर और ज़रूरतमन्द भी होते हैं ।”

1387 - (ق) عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ: أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلّى الله عليه وسلّم قَالَ: (إِذَا صَلَّى أَحَدُكُمْ لِلنَّاسِ فَلْيُخَفِّفْ، فَإِنَّ مِنْهُمُ الضَّعِيفَ وَالسَّقِيمَ وَالكَبِيرَ، وَإِذَا صَلَّى أَحَدُكُمْ لِنَفْسِهِ فَلْيُطَوِّلْ مَا شَاءَ) .

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- रिवायत है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जब तुममें से कोई लोगों को नमाज़ पढ़ाए, तो हल्की पढ़ाए। क्योंकि उनके अंदर दुर्बल, रोगी तथा ज़रूरतमंद भी होते हैं। हाँ, जब अकेला नमाज़ पढ़े, तो जितनी चाहे, लंबी करे।"

[خ703/ م467]

Similar Hadiths (Atraaf)

[انظر: 1023] .

1388 - (ق) عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المُؤْمنِينَ أَنَّهَا قَالَتْ: صَلَّى رَسُولُ اللهِ صلّى الله عليه وسلّم فِي بَيْتِهِ وَهُوَ شَاكٍ [1] ، فَصَلَّى جَالِساً، وَصَلَّى وَرَاءَهُ قَوْمٌ قِيَاماً، فَأَشَارَ إِلَيْهِمْ: (أَنِ اجْلِسُوا) . فَلَمَّا انْصَرَفَ قَالَ: (إِنَّمَا جُعِلَ الإِمَامُ لِيُؤتَمَّ بِهِ، فَإِذَا رَكَعَ فَارْكَعُوا، وَإِذَا رَفَعَ فَارْفَعُوا، وَإِذَا صَلَّى جَالِساً فَصَلُّوا جُلُوساً [2] ) .

आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने बीमारी की अवस्था में घर में नमाज़ पढ़ी। आप बैठकर नमाज़ पढ़ा रहे थे और लोग आपके पीछे खड़े होकर नमाज़ पढ़ रहे थे। इसी बीच उन्हें इशारा किया कि बैठ जाओ। जब नमाज़ पढ़ चुके तो फ़रमायाः इमाम इसलिए बनाया गया है ताकि उसकी पैरवी की जाए। अतः, जब वह रुकू करे तो तुम भी रुकू करो और जब सर उठाए तो सर उठाओ और जब 'سمع الله لمن حمده' कहे तो कहोः 'ربنا لك الحمد' कहो तथा जब वह बैठकर नमाज़ पढ़े तो तुम लोग भी बैठकर नमाज़ पढ़ो।

1389 - (ق) عَنِ الْبَرَاءِ قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللهِ صلّى الله عليه وسلّم إِذَا قَالَ: (سَمِعَ اللهُ لِمَنْ حَمِدَهُ) ، لَمْ يَحْنِ أَحَدٌ مِنَّا ظَهْرَهُ، حَتَّى يَقَعَ النَّبِيُّ صلّى الله عليه وسلّم سَاجِداً، ثُمَّ نَقَعُ سُجُوداً بَعْدَهُ.

अब्दुल्लाह बिन ज़ैद ख़ुतमी अंसारी (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि मुझे बरा (रज़ियल्लाहु अनहु) ने बताया (जो झूठे नहीं हैं) कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब 'سمع الله لمن حمده' (समिअल्लाहु लिमन हमिदहु) कहते तो हममें से कोई अपनी पीठ नहीं झुकाता, यहाँ तक कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सजदे में चले जाते। हम आपके बाद ही सजदे में जाते थे।

1391 - (ق) عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلّى الله عليه وسلّم قَالَ: (أَما يَخْشَى أَحَدُكُمْ ـ أَوْ: لاَ يَخْشَى أَحَدُكُمْ ـ إِذَا رَفَعَ رَأْسَهُ قَبْلَ الإِمَامِ، أَنْ يَجْعَلَ اللهُ رَأْسَهُ رَأْسَ حِمَارٍ، أَوْ يَجْعَلَ اللهُ صُورَتَهُ صُورَةَ حِمَارٍ) .

अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- से मरफ़ूअन (अर्थात उन्हों ने यह बात नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से नक़ल की है) वर्णनित है "क्या वह आदमी, जो इमाम से पहले अपना सिर उठाता है, इस बात से नहीं डरता कि अल्लाह उसके सिर को गधे के सिर से बदल दे अथवा उसकी आकृति गधे जैसी बना दे?"

1393 - (م) عَنِ المُغِيَرةِ بنِ شُعْبَةَ: أَنَّهُ غَزَا مَعَ رَسُولِ اللهِ صلّى الله عليه وسلّم تَبُوكَ، قَالَ الْمُغِيرَةُ: فَتَبَرَّزَ رَسُولُ اللهِ صلّى الله عليه وسلّم قِبَلَ الغَائِطِ، فَحَمَلْتُ مَعَهُ إِدَاوَةً قَبْلَ صَلاَةِ الْفَجْرِ، فَلَمَّا رَجَعَ رَسُولُ اللهِ صلّى الله عليه وسلّم إِلَيَّ أَخَذْتُ أُهْرِيقُ عَلَى يَدَيْهِ مِنَ الإِدَاوَةِ، وَغَسَلَ يَدَيْهِ ثَلاَثَ مَرَّاتٍ، ثُمَّ غَسَلَ وَجْهَهُ، ثُمَّ ذَهَبَ يُخْرِجُ جُبَّتَهُ عَنْ ذِرَاعَيْهِ فَضَاقَ كُمَّا جُبَّتِهِ، فَأَدْخَلَ يَدَيْهِ فِي الْجُبَّةِ، حَتَّى أَخْرَجَ ذِرَاعَيْهِ مِنْ أَسْفَلِ الْجُبَّةِ، وَغَسَلَ ذِرَاعَيْهِ إِلَى الْمِرْفَقَيْنِ، ثُمَّ تَوَضَّأَ عَلَى خُفَّيْهِ، ثُمَّ أَقْبَلَ.
قَالَ الْمُغِيرَةُ: فَأَقْبَلْتُ مَعَهُ حَتَّى نَجِدُ النَّاسَ قَدْ قَدَّمُوا عَبْدَ الرَّحْمَنِ بْنَ عَوْفٍ، فَصَلَّى لَهُمْ، فَأَدْرَكَ رَسُولُ اللهِ صلّى الله عليه وسلّم إِحْدَى الرَّكْعَتَيْنِ، فَصَلَّى مَعَ النَّاسِ الرَّكْعَةَ الآخِرَةَ. فَلَمَّا سَلَّمَ عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عَوْفٍ قَامَ رَسُولُ اللهِ صلّى الله عليه وسلّم يُتِمُّ صَلاَتَهُ، فَأَفْزَعَ ذَلِكَ الْمُسْلِمِينَ، فَأَكْثَرُوا التَّسْبِيحَ. فَلَمَّا قَضَى النَّبِيُّ صلّى الله عليه وسلّم صَلاَتَهُ أَقْبَلَ عَلَيْهِمْ ثُمَّ قَالَ: (أَحْسَنْتُمْ) ـ أَوْ قَالَ: (قَدْ أَصَبْتُمْ) ـ يَغْبِطُهُمْ أَنْ صَلَّوُا الصَّلاَةَ لِوَقْتِهَا.

[م274م/ الصلاة 105]

1395 - (خ) عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ: أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلّى الله عليه وسلّم قَالَ: (يُصَلُّونَ لَكُمْ، فَإِنْ أَصَابُوا فَلَكُمْ، وَإِنْ أَخْطَؤُوا فَلَكُمْ وَعَلَيْهِمْ).

अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः वे तुम्हें नमाज़ पढ़ाएँगे; अब यदि सही-सही पढ़ाएँगे तो तुम्हारे लिए होगी और यदि ग़लती करेंगे तो तुम्हारे लिए सही और उनके विरुद्ध होगी।